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Saturday, May 31, 2014

लकड़ी और पत्थर में परमात्मा का निवास नहीं होता-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन पर लेख(lakdi aur patthar mein parmatma ka niwas nahin hota-A hindi religion thought based on chankya policy)



      हमारे देश में साकार तथा निरंकार दोनों प्रकार की भक्ति को मान्यता प्रदान की जाती है। यहां तक कि अनेक अध्यात्मिक विद्वान यह भी मानते हैं कि चाहे मूर्ति पूजा करें या नहीं पर परमात्मा के प्रति सहज भाव से की गयी भक्ति अध्यात्मिक शुद्धता प्रदान करती है। यही अध्यात्मिक शुद्धता जीवन में शांति के साथ ही अपनी समस्याओं का हल करने की शक्ति प्रदान करती है। यह अलग बात है कि साकार भक्ति की आड़ में हमारे यहां अनेक प्रकार के सिद्ध मंदिर बताकर वहां लोगों को पर्यटन के लिये प्रेरित करने का प्रयास किया जाता है। प्राचीन धर्मग्रंथों की कथाओं में वर्णित महापुरुषों से संबंद्ध स्थानों को पवित्र मानकर वहां अनेक प्रकार के कर्मकांडों की परंपरायें विकसित की गयी हैं।  इनसे धर्म के व्यापारियों के वारे न्यारे होते हैं।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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काष्ठापाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्।
श्रद्धया च तया सिद्धस्तब्ध विष्णुः प्रसीदति।।
     हिन्दी में भावार्थ-लकड़ी, पत्थर एवं धातु की बनी मूर्तियों भावना पूर्वक सेवा करनी चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु अपनी कृपा का प्रसाद प्रदान करते हैं।
न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावी हि कारणम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-देव लकड़ी में विद्यमान नहीं है न ही पत्थर में विराजमान है न ही मिट्टी का प्रतिमा उसके रूप का प्रमाण है। निश्चय ही परमात्मा वहीं विराजमान है जहां हार्दिक भावना से भक्ति की जाती है।

      देखा जाये तो दिन का विभाजन प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सांय मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष यानि निद्रा के लिये होता है। देखा यह जा रहा है कि कथित तीर्थों पर लोग जाकर एक तरह से पर्यटन करने जाते हैं। वहां स्थित धार्मिक ठेकेदार दान के नाम पर कर्मकांड कराकर उनका आर्थिक शोषण करते हैं। अज्ञान के अभाव के स्वर्ग की चाहत में लोग इन कर्मकांडों में व्यय कर अपने घर लौटकर आते हैं।  इससे न तो उनके मन की शुद्ध होती है न विचार पवित्र रहते हैं इसलिये उनका जीवन फिर पुराने ढर्रे पर चलता है जिसमें बीमारी, तनाव और अशांति के अलावा कुछ नहीं रह जाता।
      जिन लोगों को अपना जीवन सहजता और शांति के साथ बिताना है उन्हें प्रातकाल के समय का उपयोग योग साधना तथा उद्यानों के भ्रमण में बिताना चाहिये।  समय मिले तो मूर्तियों की पूजा करना चाहिये पर सच यह है कि पत्थर, लोहे, पीतल या मिट्टी की बनी प्रतिमाओं में परमात्मा नहीं होते वरन् हमारे अंदर के भाव से उनमें आभास रहता है।  इस भाव का आनंद तभी लिया जा सकता है जब अपना हृदय शुद्ध हो।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, May 14, 2014

हृदय में पवित्रता न हो तो सत्संग में जाने से भी लाभ नहीं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेखhridya mein pavitrata na ho to satsang mein jaane se labh nahin- A Hindi religion thought basedrahim darshan)



                      हमारे देश में धर्म पर व्याख्यान करना भी एक तरह से पेशा रहा है। यह अलग बात है कि कथित धर्म प्रचारक कभी प्रत्यक्ष रूप से अपने परिश्रम का प्रतिफल शुल्क या मूल्य के रूप में नहीं लेते देखे गये  पर दान दक्षिणा के नाम पर उन्हें इतना मिल जाता है कि वह अपना घर चला ही लेते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख किसी पूंजीपति  से कम नहीं रह गये।  दवा, कपड़े, खानेपीने का सामान तथा पूजा सामग्री बेचने के अलावा अनेक धार्मिक संगठन तीर्थयात्राओं का भी इंतजाम करने लगे हैं। अनेक धार्मिक प्रमुखों के आश्रम राजमहल की तरह हैं तो उनके शिष्यों के आवास भी होटल से कम नहीं होते।
                      हम जिस धर्म को आचरण में लाने पर प्रमाणिक मानते हैं वही वस्तुओं के विक्रय तथा अनेक सेवाओं के लिये एक विज्ञापन की छाप बन गया है। एक तरह से बाज़ार स्वामियों  का एक बहुत बड़ा भाग धर्म की आड़ लेकर व्यापार कर रहा है। यही कारण है कि ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा देश ही धर्ममय हो रहा है पर इधर यह भी दिखाई देता है कि समाज में  नैतिक आचरण भी निरंतर पतन की तरफ जा रहा है। आर्थिक विकास दृष्टि से हम जहां आगे जा रहा है वहीं मानसिक रूप से हमारा समाज पिछड़ रहा है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रसभरा, रस काहै न होय।।
                   सरल हिन्दी में व्याख्या-यह कहना गलत है कि सत्संग का असर मनुष्य पर सदैव अच्छा होता है।  ईख के खेत में उगन वाला रसभरा पौध कभी रस से नहीं होता है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि हम भौतिक विषयों पर किसी एक सूत्र के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि मनुष्य देह जहां प्रत्यक्ष दिखती है वहीं उसमें बैठा मन कभी दिखाई नहीं देता जो कि बंदर की तरह नाचता और नचाता है। मनुष्य मन को धर्म के नाम पर सहजता से भरमाया जा सकता है। वह कब किसी तरह गुलाटी मारेगा इसका कोई तयशुदा सूत्र नहीं है। यही कारण है कि जहां हमारे देश के ऋषि मुनि समाज को हमेशा ही अन्धविश्वास  से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे हैं वहीं चालाक लोगों का एक वर्ग कर्मकांडों से समाज को स्वर्ग दिलाने की आड़ में भ्रमित करता रहा है।  आधुनिक समय में पैसे का खेल इस कदर हो गया है कि अनेक प्रकार के आकर्षक धार्मिक स्थान बन गये हैं जो जहां लोग श्रद्धा से कम पर्यटन करने अधिक जाते हैं।  अनेक पर्यटन स्थल तो सर्वशक्तिमान की दरबारों की वजह से ही प्रसिद्ध हैं। वहां भारी भीड़ जुटती है। करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आने वाले सभी लोगों को श्रद्धालू और दानी माने तो हमारा पूरा समाज देवत्व का प्रमाण माना जाना चाहिये पर ऐसा है नहीं। देश में व्याप्त भ्रष्टाचारशोषण, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, नशेबाजी और सट्टेबाजी को देखें तब लगता है कि यहां असुरों की संख्या भी कम नहीं है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि कथित रूप से धर्म की संगत करने का कोई लाभ तब तक नहीं होता जब तक अपनी नीयत साफ न हो। श्रद्धा के बिना सत्संग में जाने से मन में विचार स्वच्छ नहीं होते और इसके अभाव में मनुष्य का व्यवहार अच्छा नहीं होता।



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Friday, May 09, 2014

जीवन में संताप भोगने वाले ही आत्मप्रशंसा करते हैं-रहीम के आधार पर चिंत्तन लेख(jivan mein santap bhogne wale hi aatmprashasa karte hain-A hindi thought article on rahim darshan)



      आमतौर से आत्मप्रशंसा करने की प्रवृत्ति सभी इंसानों में स्वाभाविक रूप से  होती है पर जिन लोगों का व्यवहार असंतुलित तथा विचार संकीर्ण होते हैं उनके अंदर बिना कोई खास काम किये सम्मान पाने का मोह ज्यादा ही होता है।  अपने दुर्गुणों के कारण वह हमेशा संकट में रहते हैं पर दूसरों के सामने इस तरह प्रदर्शित करते हैं जैसे कि वह कोई विशिष्ट व्यक्तित्व के स्वामी हों।  यह अलग बात है कि एकांत में उनके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही होती हैं।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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ये रहीम फीके दुवौ, जानि महा संतापु।
ज्यों तिय कुच आपन गहे, आपु बड़ाई आपु।।
     हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई व्यक्ति रूखा व्यवहार करे तो समझ लेना चाहिये कि वह अंदर किसी महा संताप का सामना कर रहा है। ऐसे लोग आत्मप्रवंचना करते हुए केवल अपनी बात ही कहते हैं।

      जिन लोगों के अंदर सद्गुणों का भंडार होता  है वह उसको दिखाने की बजाय उसका उपयोग करते हुए सभी से  न केवल अच्छे व्यवहार की नीति पर चलते हैं वरन् अपने विचारों को भी पवित्र रखते हैं। उनकी सांसरिक विषयों के साथ अध्यात्मिक ज्ञान में भी रुचि रहती है। जिन लोगों का संपूर्ण दिन सांसरिक विषयों में बीतता है उन पर केवल माया का प्रभाव रहता है।  अध्यात्मिक ज्ञान होने की बात तो दूर वह उसके श्रवण, अध्ययन और चिंत्तन से भी बचते हैं।  सच बात तो यह है कि बिना अध्यात्मिक ज्ञान के मन में शांति हो ही नहीं सकती इसलिये अज्ञानी लोग अपना तनाव दूसरों पर डालने का प्रयास करते हैं। अपने खालीपन को वह दूसरों के विषयों में दोष से भरना चाहते हैं।
      परनिंदा, ईर्ष्या, अहंकार तथा आत्मप्रवंचना से कभी किसी को प्रशंसा नहीं मिलती वरन् पीठ पीछे लोग मजाक बनाते हैं।  इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर अध्यात्मिक साधना की प्रक्रिया से ज्ञान का सृजन करना चाहिये।


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Tuesday, May 06, 2014

भोजन करते समय मन सदैव प्रसन्न रखें-मनस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(bhojan karte samaya man prasanna rakhen-A Hindu religion thought on manu smriti)



            मनुष्य भोजन, आवास तथा वस्त्र प्राप्त करने के बाद भी संग्रह करता है जबकि पशु पक्षी तथा अन्य जीव अपनी आवश्यकता पूरी होने पर शांत होकर विश्राम करते हैं। मनुष्य जहां के मन की भूख कभी शांत नहीं होती। इतना ही नहीं जब माया का प्रभाव उस पर बढ़ जाये तो वह भोजन तक आराम से नहीं करता।  कहा जाता है कि जब भोजन करें तो मन शांत रखें पर मनुष्य खुशी हो या दुःख अपने मन के भावों को भोजन के वक्त भी जाग्रत रखता है।  आमतौर से ज्ञान तािा योग साधक भोजन को औषधि की तरह ग्रहण करते हैं पर सामान्य मनुष्य भोजन के पेट भरने के साथ जीभ के स्वाद की तृप्ति भी करना चाहते हैं। आजकल तो जीभ के स्वाद के लिये ऐसे पदार्थों को उदरस्थ कर रहे हैं जो न केवल अपाचक हैं वरन् स्वास्थ के लिये हानिकारक भी होते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि
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पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सन्।
दृष्टया हृध्येत्प्रसींदेच्च प्रतिनदेच्य सर्वेशः।

     हिंदी में भावार्थ-थाली में सजकर जैसा भी भोजन प्राप्त हो उसे देखकर अपने मन में प्रसन्नता का भाव लाना चाहिये। ऐसा अच्छा भोजन हमेशा प्राप्त हो यह कामना हृदय में करना चाहिए।
अनारोगयमन्तयुरूयमस्वगर्यं चारिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्त्परिर्जयेत्।।

     हिंदी में भावार्थ- भूख से अधिक भोजन करने से  देह के लिये अस्वास्थ्यकर है। इससे आयु कम होने के साथ ही पुण्य का भी नाश होता है। दूसरे लोग अधिक खाने वाले की निंदा करते या मजाक उड़ाते हैं।
     जब सामने थाली में भोजन आता है तो उसे देखकर हमारे मन में कोई न कोई भाव अवश्य आता है। सब्जी मनपंसद हो तो अच्छा लगता है और न हो तो निराशा घेर लेती है। भोजन पसंद का न होने पर परोसने वाला कोई बाहर का आदमी हो तो हम उससे कुछ नहीं कहते पर मन में उपजा वितृष्णा का भाव उस भोजन से मिलने वाले अमृत को विष तो बना ही देता है। घर का आदमी या पुरुष हो तो हम उसे डांटफटकार देते हैं और इससे उसी भोजन को विषप्रद बना देते हैं जो अमृत देने वाला होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के भावों से भोजन से मिलने वाली ऊर्जा का स्वरूप निर्धारित होता है।
     भोजन खाते समय केवल उसी पर ध्यान रखना चाहिये। न तो उस समय किसी से बात करना चाहिये और न ही मन में अन्य विचार लाना चाहिये। इससे भोजन सुपाच्य हो जाता है। चिकित्साविज्ञान ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भोजन करते समय तनाव रहित व्यक्ति विकार रहित भी हो जाते हैं।
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Friday, April 25, 2014

नवधनाढ्य लोगों में अहंकार आ ही जाता है-भर्तृहरि दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(navdhandhya logon mein ahahkar aa hee jaataa hai-bhartihari neeti shatak)



      जैसे जैसे विश्व में भौतिक विकास हो रहा है वैसे वैसे ही भावनातमक संवेदनहीनता का भाव बढ़ रहा है।  कभी कभी तो लगता है कि मनुष्य समुदाय में पशु से भी कम संवेदनायें रह गयी हैं।  सभी को अपने स्वार्थ की पूर्ति करने से ही समय नहीं मिलता इसलिये कोई समाज या राष्ट्र के प्रति विचार तक नहीं कर पाता।  अब तो लोगों के बीच अमीर होने की होड़ चल पड़ी है और अमीरों में शक्तिशाली दिखने के प्रवृत्ति ने समाज में वैमनस्य का भाव पैदा किया है। आर्थिक स्तर पर रिश्तों की मर्यादा तय हो रही है ऐसे में जब पुरानी संस्कृति, संस्कार या सनातन परंपरा की बात करना केवल औपाचारिकता ही लगती है।

भर्तृहरि नीति शतक  में कहा गया है कि
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पुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चतुर्दशभुंजते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर:||

     हिंदी में भावार्थ-अनेक लोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ उदार प्रवृति के  लोगों ने इसे जीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग के स्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछ ऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसके मद में लिप्त हो जाते हैं।

     यह प्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आये जिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुई जमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये और लोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन का अहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्त हो जाता है। देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब और अमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं। दरअसल अल्प धनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों की उपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।

      समाज के बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार का जिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके की सहायता  के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुर मात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकी शक्ति देखकर प्रभावित हों अथवा उनकी प्रशंसा करें  इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं। वह धन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहते हैं। सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिक शामिल हैं-गरीब पर अपनी शक्ति का प्रतिकूल प्रयोग कर उसमें भय उत्पन्न करना  चाहते हैं। परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है।
      आज के सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन के असमान वितरण की खाई चौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भी बहुत अंतर है इसके कारण सम्बन्धों  भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्ति बहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मान पाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह का सामना करना पड़ता है।
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Wednesday, April 23, 2014

धन की उष्णता के अभाव में आदमी ठंडा हो जाता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख (dhan ki garmi ke abhav mein aadmi thanda ho jaata hai-bhartrihare neeti shatak)



      मनुष्य समुदाय इस धरतीपर सदियों से सांस ले रहा है। यह मानना गलत है कि उसके मूल स्वमभाव में कोई अधिक अंतर आया है। जिस तरत अन्य जीवों-पक्षू, पक्षियों तथा जलचरों का मूल स्वभाव नहीं  बदला उसी तरह मनुष्य के रहन सहन तथा खान पान की आदतें भले ही बदली हों पर उसके विचार, चिंत्तन तथा व्यवहार में कोई अंतर न आया है न आयेगा। हम अगर अपने पौराणिक ग्रथों का अध्ययन करने तो इस बात का आभास होता है कि मनुष्य समाज आज भी वैसा ही है जैसा पहले था।  इसलिये ही उनमें व्याप्त संदेश आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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यसयास्ति वित्तं स नरः कुलीन स पण्डित स श्रुतवान्गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः।

सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।


     हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य के पास माया का भंडार उसे ही कुलीन, ज्ञानी, गुणवान माना जाता है। वही आकर्षक है। स्पष्टतः सभी के गुणों का आंकलन उसके धन के आधार पर किया जाता है।

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव।

अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।



     हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर में रहित हो जाता है तब उसकी स्थिति बदल जाते है। इस धन की बहुत विचित्र महिमा है।

     यह समाज भर्तृहरि महाराज के समय में भी था और आज भी है। हम बेकार में परेशान होकर कहते हैं कि आजकल का जमाना खराब हो गया है।सच बात तो यह है कि सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियां ही ऐसी है कि वह केवल भौतिक उपलब्धियां देखकर ही दूसरे के गुणों का आंकलन  करता है। इधर गुणवान मनुष्य अपने अंदर गुणों का संचय करते हुए इतना ज्ञानी हो जाता है कि वह इस बात को समझ लेता है कि धन से नहीं वरन गुणों से  ही उसके जीवन की रक्षा होगी। इसलिये वह समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये कोई अधिक प्रयास नहीं करता। उधर अल्पज्ञानी और ढोंगी लोग थोड़ा पढ़लिखकर सामान्य व्यक्तियों के सामने अपनी चालाकियों के सहारे उन्हीं से धन वसूल कर प्रतिष्ठित भी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इतिहास हमेशा ही उन्हीं महान लोगों को अपने पन्नों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने गुणों से वास्तव में समाज को प्रभावित किया जाता है।
      इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हमारे पास अधिक धन नहीं है तो इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए। समाज के सामान्य लोगों की संकीर्ण मानसिकता का विचार करके अपने सम्मान और असम्मान की उपेक्षा कर देना चाहिए।  जिसके पास धन है उसे सभी मानेंगे। आप अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार या कलाकार हैं पर उसकी अगर भौतिक उपलब्धि नहीं होती तो फिर सम्मान की आशा न करें। इतना ही नहीं अगर आप परोपकार के काम में लगे हैं तब भी यह आशा न करें  कि बिना दिखावे अथवा विज्ञापन के आपको कोई सम्मान करेगा। सम्मान या असम्मान से उपेक्षा करने के बाद आपके अंदर एक आत्मविश्वास पैदा होगा जिससे जीवन में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे।

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Sunday, April 20, 2014

अपनी चाटुकारिता करवाना बड़प्पन नहीं होता-संत कबीर दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(apnee chatukarita karvana badppan nahin hota- A hindu religion thought based on sant kabir darshan )



     मारे देश में में धर्म की अत्यंत महिमा है पर इसके नाम पर जिस  तरह भ्रम फैलाया गया गया है उससे देखकर यह चिंता भी होती है कि लोगों का कहीं आगे चलकर अपनी प्राचीन पंरपराओं से मोह ही न भंग हो जाये।  धर्म का आधार केवल आर्थिक आधार पर चलने वाले कर्मकांड बता कर कथित रूप से धर्म के ठेकेदार अपना उल्लू सीधा करते हैं।

संत शिरोमणि कबीर दास कहते हैं कि

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हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय

      सामान्य हिंदी में भावार्थ-अनेक बड़े लोग   हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं जिसे देखकर अन्य  लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है| सच यह कि  वह  अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि

      सामान्य हिंदी में भावार्थ- आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।

     समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म रक्षा और जनकल्याण के नाम पर चालक लोग भी व्यवसाय कर रहे हैं। इस मायावी दुनियां में सामान्य लोगों का यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया में अंतर क्या  है? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। एक तरह से कथित रूप से हमारे समाज या यह मान लिया है कि  राजा की तरह  संत को भी वैभवपूर्ण जिंदगी में  रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं। आजकल ऐसे अनेक साधू और संत देखने को मिल जायेंगे जो साहूकारों की तरह संपति संग्रह और ऋण बांटने का काम करते हैं, कुछ तो सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं।
      यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा धर्मभीरू  या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता। अत: ऐसे लोगों को आदर्श नहीं मानना चाहिए।
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