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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, July 28, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-नालायक लोग सहज भाव का मजाक बनाते हैं

            आमतौर से हम लोग अपने मित्रों या जीवन के नित्य व्यवहार में आने वाले लोगों से संपर्क बनाते समय उनकी आदतों पर ध्यान नहीं देते जो कि कालांतर में कष्टदायी सिद्ध होते हैं।  सामान्य मनुष्य पर उसकी संगति का प्रभाव अवश्य होता है। जो लोग चाहते हैं कि उनके अंदर कुविचार न आये, उनकी समाज में छवि सज्जन व्यक्ति की बने और उनके समक्ष कभी संकट न आये वह केवल इतना करें कि अपनी संगत पर ध्यान दें। ऐसे लोगों की संगत करें जिनसे मिलने पर प्रसन्नता होती हो। जो दुख देने वाले, निंदा करने वाले या असंतुलित मस्तिष्क के हैं उनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। दुष्ट लोगों की संगत इतनी बुरी है कि वह शर्मदार को डरपोक, धर्मभीरु को पाखंडी, सत्यवादियों को कपटी और वीर को क्रूर बताते हैं। इन दुष्टों में बस एक ही गुण होता है दूसरों की निंदा करना। इतना ही नहीं न ऐसे लोगों से संगत करना चाहिए न ही इनकी संगत में रहने वाले के पास जाना चाहिए।
इस विषय में महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
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जाङ्यं ह्नीमति गणयते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ कैतवं शूरे निर्घृणता मुनौ विमतिता दैन्यं प्रियालापिनि।
तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्यशक्तिः स्थिरे तत्को नाम गुणो भवेत् गुणिनां यो दुर्जनैनाकितः।।
         ‘‘दुष्ट संकोचशील पुरुषों में जड़ता, धर्मभीरुओं में पाखंड, सत्य धर्म में स्थित रहने वालों में कपट, वीरों में क्रूरता, विद्वानों में मूर्खता, नम्र लोगों में दीनता, प्रभावशालियों में अहंकार, अच्छे वक्तओं में बकवास तथा धीर गंभीर रहने वालों में असमर्थता का दुर्गुण होने का बयान करते हैं। ऐसा कौनसा गुणी आदमी है जिसमें दुष्ट लोग दोष नहीं ढूंढते।’’
              ऐसे दुष्टों की बात पर ध्यान देने से अपना ही मन खराब करना है। हम अच्छे है या बुरे इसकी पहचान हमें स्वयं ही कर सकते हैं। सीधी बात यह है कि हमारे मन में किसी के प्रति बुरा विचार नहीं आना चाहिए। दूसरा व्यक्ति अच्छा है या बुरा इसकी पहचान यह है कि भला आदमी कभी किसी निंदा नहीं करता। सज्जन आदमी हमेशा दूसरों के गुणों की प्रशंसा करता है। इतना ही नहीं दुष्ट व्यक्ति की पहचान होने पर उससे संबंध बनाये रखना ठीक नहीं है। यह सोचना बेकार है कि नियमित संबंध बनाये रखने में क्या दोष? दरअसल ऐसे दुष्ट व्यक्ति सामने कुछ न कहें पर पीठ पीछे अपने साथ का दोष बयान करने से बाज नहीं आते। अपनी छवि बनाने के लिये यह दूसरे की छवि खराब करते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 14, 2011

दूसरे को सुख देकर ही अपने सुख की आशा करें-हिन्दू धार्मिक विचार

      जिस तरह विद्युत प्रवाह दो तारों से होता है उसी तरह हमारा जीवन भी सुख दुःख दो आधारों पर चलता है। हमारे पास जो आज चीज नयी है कल उसे पुरानी होना है। हम अच्छी चीजों का उपयोग करते हैं अंततः वह कूड़े के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। यही स्थिति हमारे कर्म की है। हम जो भी कर्म करते हैं वह फल में परिवर्तित होकर हमारे पास ही आता है। इसलिये हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम दूसरे को प्रसन्न रखें। अपनी खुशी ही नहीं पूरे समाज की खुशी का विचार करें। कर्म और उसका फल जीवन का प्रवार बनाये रखने वाली उन दो तारों की तरह ही है जो विद्युत प्रवाह बनाये रखती हैं।
              दक्ष स्मृति में कहा गया है कि
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           यथैवात्मा परस्तद्वद् द्रष्टव्य सुखमिच्छाता।
           सुखदु खानि तुल्यानि यथात्मीन तथा परे।।
           सुखा वा यदि वा दुःखं यतिकांचित् क्रियते परे।
            ततस्ततु पुनः पश्चात् सर्वमात्यनि जायति।।
          ‘‘इस संसार में सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष की चाहिये कि वह दूसरे को सुख प्रदान करे क्योंकि यहां संसार में सभी सुख दुःख बराबर है। दूसरे को दिया गया सुख दुःख हमेशा ही स्वयं को प्राप्त होता है।’’
         हम एक बात ध्यान रखें कि हम जैसा व्यवहार किसी दूसरे से व्यक्ति करते हैं वह भले ही उसका तुरंत प्रतिफल न दे पर संभव है कि वह किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त हो। जैसे कि हमने किसी राह चलते हुए आदमी को पानी पिलाया तो यह जरूरी नहीं कि वह हमें वहीं तत्काल कुछ फल दे पर यह संभव है कि कहीं दूसरे स्थान पर हमें प्यास लगे तो कोई दूसरा व्यक्ति हमें पानी प्रदान करे। उसी तरह हम किसी कमजोर आदमी का अपमान करें और वह हमारी ताकत देखकर चुप हो जाये पर उसका परिणाम किसी अन्य व्यक्ति से हमें अन्यत्र मिल सकता है। एक जगह हमारे माध्यम से हुआ अपमान दूसरे स्थान पर हमारे सामने अपने अपमान के रूप में प्रकट हो सकता है।
         कहने का अभिप्राय यह है कि कर्मफल से बचना मुश्किल है। इसलिये जहां तक हो सके अपने कर्म सोच विचारकर पवित्रता के साथ करना चाहिए। आनंदपूर्वक जीवन जीने का यही एक मंत्र है। जो लोग कर्म और उसके फट का ज्ञान रखते हैं वह कभी कदाचार में लिप्त नहीं होते।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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