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Wednesday, August 12, 2009

चाणक्य नीति-सभा में जाना निर्धन के लिए जहर समान (garib aur zahar-chankya niti)

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्।।

हिंदी में भावार्थ-अगर शास्त्र का निंरतर अभ्यास न करना, पेट खराब होने पर भोजन करना, दरिद्र व्यक्ति के लिये सभा में जाना और वृद्ध पुरुष के लिये युवा स्त्री विष की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में हर व्यक्ति किसी किसी प्रकार की पुस्तकों से शिक्षा प्राप्त करता है। शिक्षा प्राप्त करने का उसका उद्देश्य ज्ञान और रोजगार प्राप्त करना-दोनों ही या दोनों में से कोई एक-हो सकता है। ऐसे में उसे अपनी पुस्तकों या शास्त्रों का नियमित अभ्यास करते रहना चाहिये। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसके लिये अलाभकर स्थिति हो जाती है। एक तो वह पूर्ण रूप से अपने विषय या ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाता जिसकी वजह से उसे सफलता नहीं मिलती और मन अशांत रहता है दूसरा यह कि उसे पहले पढ़े हुए विषय दिमाग में घूमते रहते हैं और कुछ नया सोच ही नहीं सकता। इस तरह उसके जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वैसे आजकल इंसान के लिये स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय करना कठिन हो गया है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अगर आदमी को उससे संबंधित रोजगार न मिले तो उसका अभ्यास नहीं रह जाता। आजकल रोजगार की जो स्थिति है उससे तकनीकी, विज्ञान, वाणिज्य तथा साहित्य विषयों में उपाधियां प्राप्त करने वाले सभी लोगों को उससे संबंधित काम नहीं मिल पाता और अनेक लोगों को जीवन यापन के लिये जब उसे कोई अन्य नौकरी या व्यवसाय करना पड़ता है पर अपनी पूर्व शिक्षा के कारण उनको बहुत मानसिक कष्ट होता है। तब उन्हें अपना जीवन ही विषैला लगता है। aur
उसी तरह अगर कोई ज्ञान जीवन के लिये प्राप्त किया है तो उसका निंरतर अभ्यास करना चाहिये ताकि वह याद रहे और समय आने पर उस ज्ञान से हम अपनी रक्षा कर सकें।
यही स्थिति भोजन की है। जब हमारा पेट खराब हो तब भोजन नहीं करना चाहिये। ऐसे में अगर जबरन भोजन किया तो अपना स्वास्थ्य अधिक बिगड़ जाता है। वैसे भी कहते हैं कि भूख से कम, खाने से लोग अधिक बीमार पड़ते हैं। शरीर की बीमारियों का मुख्य कारण पेट का खराब होना ही है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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